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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
प्रसार्य वाहू पततः प्रसार्य चरणावपि |  २७   क
रूपं पितुरपश्यं तच्छकुनेः पततो यथा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति