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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रं धर्मं महाराज समवेक्षितुमर्हसि |  १३   क
न हि धर्मो महाराज क्षत्रिय़स्य वनाश्रय़ः |  १३   ख
राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रिय़स्य विदुर्वुधाः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति