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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
शल्यस्तु समरश्लाघी धर्मराजमरिन्दमम् |  ३२   क
ववर्ष शरवर्षेण वर्षेण मघवानिव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति