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विराट पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स महावाहुर्विजजृम्भे जिघांसय़ा |  १७   क
ततः स व्याय़तं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च |  १७   ख
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम वहिस्तदा ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति