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द्रोण पर्व
अध्याय १४९
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सञ्जय़ उवाच
गृहीत्वा च महाकाय़ं राक्षसेन्द्रमलम्वलम् |  ३१   क
उद्यम्य न्यवधीद्भूमौ मय़ं विष्णुरिवाहवे ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति