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भीष्म पर्व
अध्याय ४
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व्यास उवाच
परस्परज्ञाः संहृष्टा व्यवधूताः सुनिश्चिताः |  ३३   क
पञ्चाशदपि ये शूरा मथ्नन्ति महतीं चमूम् |  ३३   ख
अथ वा पञ्च षट्सप्त विजय़न्त्यनिवर्तिनः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति