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द्रोण पर्व
अध्याय १४९
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नन्तरे राजञ्जटासुरसुतो वली |  ५   क
दुर्योधनमुपागम्य प्राह प्रहरतां वरः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति