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सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव नरशार्दूलस्तावग्निसमतेजसौ |  १   क
सञ्जहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनञ्जय़ः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति