सौप्तिक पर्व  अध्याय १५

वैशम्पाय़न उवाच

द्रौणिरप्यथ सम्प्रेक्ष्य तावृषी पुरतः स्थितौ |  ११   क
न शशाक पुनर्घोरमस्त्रं संहर्तुमाहवे ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति