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सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
विसृष्टं हि मय़ा दिव्यमेतदस्त्रं दुरासदम् |  १६   क
अपाण्डवाय़ेति मुने वह्नितेजोऽनुमन्त्र्य वै ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति