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सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सञ्जहारास्त्रं पुनरेव धनञ्जय़ः |  ५   क
संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संय़ुगे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति