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सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी व्रती चापि दुरवापमवाप्य तत् |  ९   क
परमव्यसनार्तोऽपि नार्जुनोऽस्त्रं व्यमुञ्चत ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति