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स्त्री पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
सा तानेकैकशः पुत्रान्संस्पृशन्ती पुनः पुनः |  १२   क
अन्वशोचन्त दुःखार्ता द्रौपदीं च हतात्मजाम् |  १२   ख
रुदतीमथ पाञ्चालीं ददर्श पतितां भुवि ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति