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स्त्री पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे जीवितेनार्थो न राज्येन धनेन वा |  ४   क
तादृशान्सुहृदो हत्वा मूढस्यास्य सुहृद्द्रुहः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति