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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |  १२   क
दण्डस्यैव भय़ादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति