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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
तानत्ति पुरुषः सर्वान्पश्य धर्मो यथागतः |  २२   क
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं जङ्गमं स्थावरं च यत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति