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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
ग्रामान्निष्क्रम्य मुनय़ो विगतक्रोधमत्सराः |  २७   क
वने कुटुम्वधर्माणो दृश्यन्ते परिमोहिताः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति