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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
निर्ददाह जगत्कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् |  १२९   क
महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशय़ः ||  १२९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति