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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्यं चेदं व्रह्मणा पूर्वमुक्तं; दण्डः प्रजा रक्षति साधु नीतः |  ३१   क
पश्याग्नय़श्च प्रतिशाम्यन्त्यभीताः; सन्तर्जिता दण्डभय़ाज्ज्वलन्ति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति