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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
येऽपि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिका वेदनिन्दकाः |  ३३   क
तेऽपि भोगाय़ कल्पन्ते दण्डेनोपनिपीडिताः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति