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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यदि दण्डान्न विभ्येय़ुर्वय़ांसि श्वापदानि च |  ३६   क
अद्युः पशून्मनुष्यांश्च यज्ञार्थानि हवींषि च ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति