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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वलोपः प्रवर्तेत भिद्येरन्सर्वसेतवः |  ३८   क
ममत्वं न प्रजानीय़ुर्यदि दण्डो न पालय़ेत् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति