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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते |  ४   क
एतद्विद्वन्नुपादत्स्व स्वभावं पश्य लौकिकम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति