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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यदिदं धर्मतो राज्यं विहितं यद्यधर्मतः |  ४६   क
कार्यस्तत्र न शोको वै भुङ्क्ष्व भोगान्यजस्व च ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति