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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थे सर्वे समारम्भाः समाय़त्ता न संशय़ः |  ४८   क
स च दण्डे समाय़त्तः पश्य दण्डस्य गौरवम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति