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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति नस्तकान् |  ५१   क
कृषन्ति वहवो भारान्वध्नन्ति दमय़न्ति च ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति