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वन पर्व
अध्याय २७८
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अश्वपतिरु उवाच
अपि राजात्मजो दाता व्रह्मण्यो वापि सत्यवान् |  १६   क
रूपवानप्युदारो वाप्यथ वा प्रिय़दर्शनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति