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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यज देहि प्रजा रक्ष धर्मं समनुपालय़ |  ५३   क
अमित्राञ्जहि कौन्तेय़ मित्राणि परिपालय़ ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति