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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि पुरुषः शालां पुनः सम्प्रविशेन्नवाम् |  ५७   क
एवं जीवः शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति