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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
दण्डस्यैव भय़ादेके न खादन्ति परस्परम् |  ७   क
अन्धे तमसि मज्जेय़ुर्यदि दण्डो न पालय़ेत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति