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अनुशासन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
सहस्राणि मुनीनां च अय़ुतान्यर्वुदानि च |  २४   क
नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वताः सागरा दिशः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति