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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारय़ेत् |  १८   क
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति