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अनुशासन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
यस्त्वां ध्रुवं वेदय़ते गुहाशय़ं; प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् |  ४४   क
हिरण्मय़ं वुद्धिमतां परां गतिं; स वुद्धिमान्वुद्धिमतीत्य तिष्ठति ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति