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अनुशासन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
एवमुक्ते मय़ा पार्थ भवे चार्तिविनाशने |  ४६   क
चराचरं जगत्सर्वं सिंहनादमथाकरोत् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति