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अनुशासन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् |  ४८   क
राशय़ो निपतन्ति स्म वाय़ुश्च सुसुखो ववौ ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति