अनुशासन पर्व  अध्याय १५

कृष्ण उवाच

वृणीष्वाष्टौ वरान्कृष्ण दातास्मि तव सत्तम |  ५१   क
व्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ||  ५१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति