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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो महावलः |  १८   क
यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति