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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि |  २४   क
सत्यं धर्मो मतिश्चाग्र्या स्थितिश्च सततं स्थिरा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति