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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमतः |  २९   क
स्थिता समुद्रवसना सशैलवनकानना |  २९   ख
चिता रत्नैर्वहुविधैः कुरुराजस्य पाण्डव ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति