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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेण राजा धर्मज्ञः पातु सर्वां वसुन्धराम् |  ३०   क
उपास्यमानो वहुभिः सिद्धैश्चापि महात्मभिः |  ३०   ख
स्तूय़मानश्च सततं वन्दिभिर्भरतर्षभ ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति