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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
इदं शरीरं वसु यच्च मे गृहे; निवेदितं पार्थ सदा युधिष्ठिरे |  ३२   क
प्रिय़श्च मान्यश्च हि मे युधिष्ठिरः; सदा कुरूणामधिपो महामतिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति