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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
इतीदमुक्तं स तदा महात्मना; जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुनः |  ३४   क
तथेति कृच्छ्रादिव वाचमीरय़; ज्जनार्दनं सम्प्रतिपूज्य पार्थिव ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति