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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
शैलेषु रमणीय़ेषु पल्वलेषु नदीषु च |  ४   क
चङ्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति