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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
एष देवो महादेवो जगत्सृष्ट्वा चराचरम् |  १८५   क
कल्पान्ते चैव सर्वेषां स्मृतिमाक्षिप्य तिष्ठति ||  १८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति