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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वचरणे वृद्धः संमतोऽर्थविशारदः |  ११   क
साम्वाख्यो वह्वृचो राजन्वक्तुं समुपचक्रमे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति