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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा व्रवीति धर्मज्ञो मुनिः सत्यवतीसुतः |  १७   क
तथा कुरु महाराज स हि नः परमो गुरुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति