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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूतांस्ततस्तांस्तु वाष्पकण्ठान्महीपतिः |  २   क
धृतराष्ट्रो महीपालः पुनरेवाभ्यभाषत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति