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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
भवद्वुद्धिय़ुजा चैव पाण्डुना पृथिवीक्षिता |  २०   क
तथा दुर्योधनेनापि राज्ञा सुपरिपालिताः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति