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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
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श्रीभगवानु उवाच
एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा |  ६६   क
सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी |  ६६   ख
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकसः ||  ६६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति