आश्रमवासिक पर्व  अध्याय १५

वैशम्पाय़न उवाच

पित्रा स्वय़मनुज्ञातं कृष्णद्वैपाय़नेन वै |  ४   क
वनवासाय़ धर्मज्ञा धर्मज्ञेन नृपेण च ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति