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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहं पुनः पुनर्याचे शिरसावनतोऽनघाः |  ५   क
गान्धार्या सहितं तन्मां समनुज्ञातुमर्हथ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति